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तड़प मेरी ...मै हो नारी

तड़प मेरी ...मै हो नारी 

अशकें मेरी 
मोम की तरह पिघलती रही 
नयनो मै मेरे 
रातभर शमा जलती रही 
वो हर पल 
नजरों से गुजरती रही 
सांसों  की नजम
मेरी हल्के से चलती रही 
अशकें मेरी ....................

चेहरे के मेरे 
भाव पल पल उबरते रहे
कभी मुझे 
हंसते रहे कभी रुलते रहे 
परछाइयां भी मेरी 
मुझ से बातें करती रही 
कभी मुझे और
कभी मेरी बातों कटती रही 
अशकें मेरी ....................

मन और तन 
की इस उलझन रतभर सुलझाती रही
कभी चाँद बदली मै 
बदली मै चाँद अटखेलियाँ लेती रही  
अपने आप 
से हरदम मै  ये ही पुछती  रही 
अंधेरे से चिराग 
रोशनी के लिया यूँ ही जलत्ती रही 
अशकें मेरी ....................

पुरष प्रधान समाज 
अपने अस्तीत्व के लिया लडती रही 
एक कोनै नारी बनकर 
मै अपने आप से सीमाटती रही 
जब कभी भी 
उड़न चाह इस खुले असमान मै 
मेरे परों पर
समाज रूपी आरी चलती रही 
अशकें मेरी ....................

अशकें मेरी 
मोम की तरह पिघलती रही 
नयनो मै मेरे 
रातभर शमा जलती रही 
वो हर पल 
नजरों से गुजरती रही 
सांसों  की नजम
मेरी हल्के से चलती रही 

बालकृष्ण डी ध्यानी 

देवभूमी बद्री-केदारनाथ 



कवी बालकृष्ण डी ध्यानी
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