याद
चल रही है चलती जायेगी
रुक रुक के याद वो आयेगी
कभी अश्कों मै डूब जायेगी
कभी फूलों खिल खिलायगी
अंचल मै कभी तु बादलूं मै छुप जायेगी
कभी ओस की बूंद बनकर उभर आयेगी
इन्द्र धनुष के आसमानी रंग मै निखर जायेगी
छाजै मै बैठी कबूतरी की तरह तनहा गुरायेगी
एक एक कर हरदम मुझे याद आयेगी
इस दिल से तु भी कैसे जुदा रहा पायेगी
गुल के साथ साथ कंटे भी खिलेंगे
हम फिर एक बार तुम से मीलेंगे
जुदाई भी अब रस ना आयेगी
तुम को भी मेरी याद आयेगी
मेरी तरंह ओ मेरी महबूबा
तुम्हारी आंखें भी भीग जायेगी
चल रही है चलती जायेगी
रुक रुक के याद वो आयेगी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी


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