
चौक में आशिकी
चौक पर खडा आशिक आज
हास्य कविता व्यंग के साथ
कभी प्रभात तो कभी नभ की होती रात
ठह्के संग गूंजे नजरों के बाण
दो नैना जुड़े चार एक होये प्राण
ले हाथों को हाथों में थाम
बेशर्म की सीमा जी कर गये लांध
जला ८४० वोल्टस बल्ब का बुखार
सबके सामने आँखों में ऐनक ले थाम
प्रेम की लगी बाहार चौक में आज
खड़े आशिक सीना तान
मुख से निकले भदा गान
चेहरे पर फ़ैली यूँ मुस्कान
पान थूके दीवारें बनी पीकदन
गुजरना भी मुश्किल हुआ
दर्द मेरा मुझसे रहा ना गया
मजनू लैला से मै हार सा गया
अब तू हर चौक ऐ नजरा है
शहर गाँव गल्ली गुच्चे
जंहा देखा अब ऐ नजरा है
प्रेम के पथ से पथीक भटक गया
प्यार का आचार बीच बाजार
बेचना था वो बेच रहा
अपना सिक्का वो खेल रहा
चौक पर खडा आशिक आज
हास्य कविता व्यंग के साथ
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
बालकृष्ण डी ध्यानी

0 टिप्पणियाँ