अपने से उसे कैसे निकालों मै
अपने से उसे कैसे निकालों मै
जो मेरे अंदर छुपा है जी
इंसान हूँ मैं मैं हूँ उसकी इंसानियत
आज दबी है वो दिल के किस चौराहे पे
आँखों से बहता दर्द हो पराया
मेरी हंसी किसी दर्द भरे चेहरे खिलाऊँ मैं
भूखे को रोटी अगर बन जाऊं
नंगे बदन को मैं कपड़ा
अपने लिए तो यंहा जीते सभी हैं
किसी गैर के लिए अगर मैं जी जाऊं
जीना मेरा जीना तब होगा सार्थक
कसी और के दुःख दर्द का प्याला मैं पी जाऊं
राग द्वेष का वो झूठा आडंबर
अहंकार से घिरा वो अहंकारी मन
लाभ लोभ के लालच में जग
कैसे इन से अकेला बच जाऊं मैं
अपने से उसे कैसे निकालों मै .......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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