गर अश्कूं से शमा जलती
गर अश्कूं से शमा जलती
तो हवाऊं का क्या कम होता
थपेडे मरती रहती थपेडे मरती रहती
मोहबत पर ये इलजाम होता
गर अश्कूं से शमा जलती .....
रेत पर कोई आशीयाँ बनाया
तो साहील का क्या होगा
डूबा तै कश्ती का डूबा तै कश्ती का
समुद्र पर ये इल्जाम होता
गर अश्कूं से शमा जलती .....
बरसात की ये बूंदे बूंदे
लगती है दिल को अगन
जलाता मै इधर जलाता मै इधर
परवाने पर ये इल्जाम होता
गर अश्कूं से शमा जलती .....
उदशी भरी होई यंहा
मातम का नजारा होता
कैसे बहलाये हम कैसे बहलाये हम
खुश्यीओं पर ये इलज़ाम होता
गर अश्कूं से शमा जलती .....
गर अश्कूं से शमा जलती
तो हवाऊं का क्या कम होता
थपेडे मरती रहती थपेडे मरती रहती
मोहबत पर ये इलजाम होता
गर अश्कूं से शमा जलती .....
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी


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