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मेघ से गिरती बूंदे

मेघ से गिरती बूंदे

मेघ से गिरती बूंदे
धरती को आके चुमे
फिर कुछ पलों बाद
उनमे से अंकुर फूटे
मेघ से गिरती बूंदे....

हरयाली छायी
मदहोशी कैसी आयी
मस्त बहरूं को देख
ऋतू भी मुश्कायी
मेघ से गिरती बूंदे....

नीला नीला चाहों और
लगे गिला गिला सा
भरारी मरता है मनमोर
उशकी खुशी का नहीं ठौर
मेघ से गिरती बूंदे....

मन की बातें मन ही जाने
इस तन का नहीं छोर
प्रीतम को पाने के लिये
हो जाता है खुद ही वीमोड़
मेघ से गिरती बूंदे....

एक तडप है इन आँखों मै
एक कशक उन बातों मै
एक ख्व्यीश इन होठों की
मेघ से गिरती बूंदे बूंदे
इन हाथों को आके चुमे
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी
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