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संगनी हो तूम मेरी ......................................

संगनी हो तूम मेरी ......................................

तुम्हे देखा तू ये सा लगा की जनत मील गयी 
मेरी रहें दोर तक देखो फूलों से भर गयी 
परीयुं की रानी हो तूम या कोई कहनी हो तुम 
सात सुरों की सरगम की रवानगी हो तुम
तुम्हे देखा तू ये सा लगा की....................

सूरज की लाली या चाँद की बदली हो तुम 
या  झिलमिल तारों की कजरी हो तुम 
स्नेह को स्नेह मै बधन  मै बंधने वाली 
मेरे मन को मेरे मन से हारने वाली कोँन हो तुम
तुम्हे देखा तू ये सा लगा की....................

तप तपते रेगीस्तान मै पानी की बूंद हो तुम
भटके हुये रही की  उमीदों की मंजील हो तुम
जीन्दगी के अन्तिम  पड़वा पर पहुंच कर भी
उस प्यासे के लिये पानी से भरी गगरी हो तुम
तुम्हे देखा तू ये सा लगा की....................

मन को छलकती तन को पिघलती 
बदलूँ से छनकर आती कोई किरण हो तुम
खुश्बो की तरहं महकती चीडीयों की तरहं चहकती
सुख और दुख के बीच खीची एक सीधी सी लकीर हो तुम
तुम्हे देखा तू ये सा लगा की....................

ब्याह के भी लाया मै  उसको आपना  बनाया मै 
मेरे परिवार से जुड़ी वो गम मै भी खीलाये खुशी वो 
दिल के दो  फूल के साथ गमला भी लगया 
जीवन के सवेरे हमने एक प्याली चाय  संग मनया
तुम्हे देखा तू ये सा लगा की....................

तुम्हे देखा तू ये सा लगा की जनत मील गयी 
मेरी रहें दोर तक देखो फूलों से भर गयी 
परीयुं की रानी हो तूम या कोई कहनी हो तुम 
सात सुरों की सरगम की रवानगी हो तुम
तुम्हे देखा तू ये सा लगा की....................

बालकृष्ण डी ध्यानी 
देव भूमी बद्री -केदारनाथ


कवी बालकृष्ण डी ध्यानी
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