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अब णी हुये तब कब हुये


अब णी हुये तब कब हुये

अब णी हुये तब कब हुये
मेरे मुल्क से सब दुर गे
तू भीतर का भीतर ही रे
जमानु देख कखक पूछगे  
अब णी हुये तब कब हुये

रहेंण-सेण सब बदली गे 
चीमीण बदल बल बिजली ये
बंजा पुंगड अब कांड बल 
यख छुडी सब शहर बसीगे 
तू भीतर का भीतर ही रे

पन्त्दैर बल  अब छुटी गे
कंश्य घासेरी अब पिघली गे
स्टील-गलाश अब चमकी गे 
गाम गाम बल  नलका लगी गे
अब णी हुये तब कब हुये

डाणडी मेरा बल रीत  गे 
टेड मेडा बल सडकी  ये गे 
जीप बस की रंगा लगी गे 
लोगों भरयूँ बटवा खाली हुये गे
तू भीतर का भीतर ही रे

अंगरेजी की बल बाटल ये 
थैली बल कखक लोकी गे 
रस और मंडण तु छुडी की 
डिस्को -ब्रेक मा तु झूमी गे 
अब णी हुये तब कब हुये

अब बरखा बल खूब पडे
गादयन रुन्ल्याँ बहुरीगे 
कची सडकी बल रूडी गे  
कदक जण बल मोरी गे  
तू भीतर का भीतर ही रे

चीतरी-पत्री बल अब भूली गे
नेट-मोबाइल से बल जी लगे
सेट-लईट मा अब टीवी दीखे
तु अंधारु का अंधारु मा रे 
अब णी हुये तब कब हुये

तु जण भी रहे बल सद खुश रे 
माया दगडी ना बल दिल लगे 
तु बल गरीब का गरीब ही रहे 
खाई पीकी बल तील दीण कटे
तू भीतर का भीतर ही रे

अब णी हुये तब कब हुये
मेरे मुल्क से सब दुर गे
तू भीतर का भीतर ही रे
जमानु देख कखक पूछगे  
अब णी हुये तब कब हुये

बालकृष्ण डी ध्यानी 
देवभूमि बद्री-केदार नाथ


कवी बालकृष्ण डी ध्यानी
 मेरा ब्लोग्स
 http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com // 
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
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