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कविता

कविता 

कविता भी मोड़ लेती है
सारे पलों को औड लेती है
खयालो के सहरे 
अंतर पटल का द्वार खुल देती है
कविता भी मोड़ लेती है

सुख दुःख अमीरी गरीबी 
को नीचुआड लेती है
अपनी मन की भावन को 
नयनों से औढेल देती 
कविता भी मोड़ लेती है

प्रेम के रस कभी विरह रस 
मै गुआतै खाती 
कभी मजनू बनकर वो 
लैला लैला पुकरती है 
कविता भी मोड़ लेती है

जाते जाते सीख दे जाती 
आपने परयै का भेद बताती 
कभी फूल के संग तू
कभी काटों के संग हंसती है
कविता भी मोड़ लेती है
  
कलम के सहरे 
पन्ना को घेर लेती है
एक नयी क्रांती को
आपने आगोश ले लेती है
कविता भी मोड़ लेती है

बालकृष्ण डी ध्यानी 

देवभूमी बद्री-केदारनाथ 


कवी बालकृष्ण डी ध्यानी
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