अकेला ही खड़ा रहा मै
अकेला ही खड़ा रहा मै
आपने से ही आडा रहा मै
ना ही रहा कीसी पे इतबार
ना कीसीसे अब रहा प्यार
अकेला ही खड़ा रहा मै ......
देखा रहा हूँ उझल होते रवी को
कुछ कह रहा भीतर बैठे कवी को
जाते जाते मै तू कुछ दे के गया
और तू खड़ा का खड़ा रहा गया
अकेला ही खड़ा रहा मै ......
फिर कली निशा रात्री मै परवर्ती होई
मेरे मान के भीतर ओ भी गर्हरीत होई
उस नै भी कहा जाते जाते आँखों मै सपने देगई मै
और तू सोया का सोया रहा गया
अकेला ही खड़ा रहा मै ......
आंख खुली तू सुबह होई
एक नई जड़ चेतन संचारित होई
पर कीराणु से मेरी नहीं बनी
उगते सूरज से फिर ठानी
अकेला ही खड़ा रहा मै ......
खड़ा का खड रहा गया
अपने आप ही कट गया
मनाने की कोशीश थी आपने
मेरा अहम् मुझे ही खा गया
अकेला ही खड़ा रहा मै ......
अकेला ही खड़ा रहा मै
आपने से ही आडा रहा मै
ना ही रहा कीसी पे इतबार
ना कीसीसे अब रहा प्यार
अकेला ही खड़ा रहा मै ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमी बद्री केदारनाथ
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी


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