अधुरा प्रेम पत्र जो पुरा ना हो सका
यादों मै खोया प्यार मै रोया
तन्हा रात मै चाँद के पलक पर
खाबुँ को आपने मै सजाता
कलम उठा कर उसे लिख ना सका
अधुरा प्रेम पत्र जो पूरा ना हो सका
एक लडकी जो लगी भली सी
खिली मन मै कली कली सी
पुहंचा वंहा जंह उसकी गली थी
क़दमों को आगे बड़ा ना सखा
अधुरा प्रेम पत्र जो पुरा ना हो सका
क्या कशिश थी उन आँखों की
उन आँखों से नजरें हाटा ना सका
कोशिश की थी नजरों नै मेरी मगर
दिल की बात उठों तक ला ना सका
अधुरा प्रेम पत्र जो पूरा ना हो सका
डर था उस के ना कहने से मै
यही गम सीने खलता रहा
परवाह की समाज की मैने
उन को रुसवा ना कर सका
अधुरा प्रेम पत्र जो पूरा ना हो सका
यादों मै खोया प्यार मै रोया
तन्हा रात मै चाँद के पलक पर
खाबुँ को आपने मै सजाता
कलम उठा कर उसे लिख ना सका
अधुरा प्रेम पत्र जो पूरा ना हो सका
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी

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