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छ्लावा


छ्लावा 

कब तक चलेगा
कब तक..........छलेगा
मन तन को 
तन मन को बाँवरे 

छलेगा ऐ उजाला दूर तक 
अंधेरे साजिश करेंगे
खोजेगा मन फिर भी 
तन तुझको ढुंड़ा करेगा 
कब तक चलेगा
कब तक..........छलेगा
मन तन को 
तन मन को बाँवरे 

एक दीपक तो जलाओ
उजाले अँधेरे को करीब लाओ 
मुझे मेरी परछाई से मिलाओ 
क्या निकलेगा कोई रास्ता 
कब तक चलेगा
कब तक..........छलेगा
मन तन को 
तन मन को बाँवरे 

निष्ठुर है बड़ा 
तुझको रास नहीं आयेगा 
चालाकी से दूर कंही चला जायेगा 
पलक झपक ओझल हो जायेगा 
कब तक चलेगा
कब तक..........छलेगा
मन तन को 
तन मन को बाँवरे 

उम्र भर जुदाई दे जायेगा 
मुखौटा ओढ़ रह जायेगा 
छ्लावा छल जायेगा 
हाथ तेरे कुछ ना आयेगा 
कब तक चलेगा
कब तक..........छलेगा
मन तन को 
तन मन को बाँवरे 

एक उत्तराखंडी 

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत 

बालकृष्ण डी ध्यानी
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