
वो अपना
बंधिशों के तारों से बंधा सामा मेरा
पिंजड़े में जड़ा वो सोने का ताला मेरा
अहम ने खाया मूल जड़ से मुझको
तना ना रहा अब वो तना मेरा
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा
जकड़ा सा वो अस्म में इस तरह
अकडा सा वो जिस्म में इस तरह
पंख है पर कटे कटे से क्यों उड़ रहे
आफत में फंसा वो साथ है जैसे
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा
औकात हैसियत से निकह हो गयी
इश्तहार अत्फ़ का अदा हो गया
अफ़सुर्दा था अफ़स़ना उस दरफ पर
अब्तर के अंजुमन मै दफन हो गयी
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा
आँच के आगोश जल रहा मन मेरा
अब तो आज़माईश के करवाँ चल पड़े
आयन्दा के कोने में सितम छिपे कितने
एक एक कर आये वो गुजर गये
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा
फलसफ मेर यूँ ही चलता रहा संग मेरे
वक्ता आता रहा जंजीरों में जकड़ता रहा
रिश्ते के लिये देह मेर अब जी ता रहा
मन अकेले में बैठे बैठे बस रोता रहा
बांध कर रखा मुझ को वो अपना मेरा
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
बालकृष्ण डी ध्यानी

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