
तू व्यर्थ ही
सोना ना चांदी
से ना कोइ और मोल लगाये
किस मोह में पड़ा तू राही
तू व्यर्थ ही शोर लगाये
बसना दो पल यंहा
मिलना फिर कल कंहा
वो ना आया ना आयेगा
ऐ वक्त यूँ चला जायेगा
तू व्यर्थ ही शोर लगाये
सज रहा क्यों आज
निकली किसकी बारात
सैर फूलों से सजा माथा
भाग में छुपा क्या विधाता
तू व्यर्थ ही शोर लगाये
फुर बैठ फुर उड़ जायेगा
हथेली रेखा बीच क्या पायेगा
मिटने वाला मिट जायेगा
मिट्टी में ही सकूंन आयेगा
तू व्यर्थ ही शोर लगाये
जीले दो घड़ी
साँस बची थोड़ी सही
दो पल चिंता में चला जायेगा
बाद चिता में जल जायेगा
तू व्यर्थ ही शोर लगाये
सोना ना चांदी
से ना कोइ और मोल लगाये
किस मोह में पड़ा तू राही
तू व्यर्थ ही शोर लगाये
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
बालकृष्ण डी ध्यानी

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