
उस घाव से
तरल पदार्थ था वो नशीला सा भरकर
जो आँखों ने यूँ तेरी मुझे पिला दिया
कहा किसी ने की वो मदिरा थी
मैंने कहा जीने की राह वो बता गया
दर्द का रिसाव मंद किया आसव से
बहता रहा वो मंद मंद उस घाव से
दो बूंदों की देर थी मुझे बस घेर लिया
जमाने ने तब से ही मुझसे मुंह फेर लिया
मद्य था वो मुझे मद मस्त किया
इन्द्रियों को चहों ओर से मेरे चुस्त किया
नजरों ने बस उन दो आँखों को चार किया
अपनों को तब मैंने खुद से ही खो दिया
पेय पदार्थ था वो लडखडा सा गया
प्याल जाम का छलकाना था छलका सा गया
अभी दो साँस बाकी थी सीने में और जीने में
नजरें का शोर बस उन आँखों की ही ओर गया
तरल पदार्थ था वो नशीला सा भरकर
जो आँखों ने यूँ तेरी मुझे पिला दिया
कहा किसी ने की वो मदिरा थी
मैंने कहा जीने की राह वो बता गया
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
बालकृष्ण डी ध्यानी

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