इस पल में
इस पल में सब खोये से लगे
अपने आप में सोये से लगे
विचारों में कंही कोई गुम
कोई यंहा खयालों में सुम
ऐ पल गंवाकर ऐसे ही
दूजे पल की फ़िक्र की पड़ी धुंद
जीवन चले कंहा किस ओर
कौन सी मंजील कौन सी डगर पर
हैरान हूँ परेशान हूँ अपने आप से
मै कुछ इस तरह लगा हूँ अपने आप में
अपने ही दीवारों के प्रश्नों में अटका हूँ
अपने ही घर में उत्तर से उसके उलझा हूँ
बैठ दो पल सुस्ता ले
दो प्रेम के अपनों से बतिया ले
फिर रैन मिले ना मिले इधर
इस पल में हंस ले तू उनको हंसा दे
इस पल में सब खोये से लगे
अपने आप में सोये से लगे
विचारों में कंही कोई गुम
कोई यंहा खयालों में सुम
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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