बदल जाते हैं
दिन बदल जाता है
मै वही मै वन्ही रह जाता हूँ
एक यादों का झरोखा है
वो सच्चा है या फिर धोखा है
बांध कर रखा है उसे सीने से
रास आता है मुझे अब ऐसे जीने में
आता है जाता है पल
मै बीते पल में ही रह जाता हूँ
एक इन्तजार है उसके आने का
मुझ को मुझसे दूर ले जाने का
उस ख़याल में ही मै अब जीता हूँ
उस वादे के लिये ही बैठा हूँ
दिन बदल जाता है
मै वही मै वन्ही रह जाता हूँ
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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