अपने को छुपा रखा
अपने को छुपा रखा
उस मकबरे सीने में दबा रखा है
बस सांस ही चलती है भक भक
नक छिद्रों से झक झक
अपने को छुपा रखा.............. ……
आँखों ने कोण बना रखा है
सबको समकोण सा सजा रखा है
कानों कि देख-रेख में
बालों के अड़े तिरछे फेर में
अपने को छुपा रखा.............. ……
माथे कि लकीरों में
हाथों कि तकदीरों में
दो बाहों को फैला रखा है
इस पेट को अड़ा रखा है
अपने को छुपा रखा.............. ……
जांध का ले सहारा
पैरों ने ताड़ा वो किनारा
उंगलियां ही बस ये थिरकी हैं
साथ वो पलकें अब झपकी है
अपने को छुपा रखा.............. ……
शरीर के इस आकार साथ
फिर रहा हूँ बस मौका झाड़ में
लहू और आँतों के खेल में
आत्म और दिमाग के व्यापार में
अपने को छुपा रखा.............. ……
बस मै रह गया तेरे प्यार में
गड़बड़ा गया माया संसार में
जोड़ गुना भागा से भागा मै
अपने आप से अब हार मै
अपने को छुपा रखा.............. ……
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित
बालकृष्ण डी ध्यानी


0 टिप्पणियाँ