पास मेरे आ जा
मेरे
आस पास आज
नजदीकियां दूरियां
ऊंचाईयां गहराईयां
बनते बिगड़ते
लड़ते झगड़ते
टूटते लड़खड़ते
रिश्तों कि तस्वीरें
टंगी दीवारों में
कुछ तिरछी कुछ सुलझी
कुछ धूल खायी
कुछ कांच चटकी
अपने से लटकी
नजरों में किसी के ख़टकी
लेना देना और देना
और सब कुछ ले जाना
ना तेरा ना मेरा
किस्सा ये अंजाना
ले जाता है दूर कंही
अकेले में तन्हा
अपनों से वो बेगाना
सफर कंहा चला
बड़ा याद आता है
पीछे छूटा वो
एक मेरा गाँव पुराना
किसी कोने में बैठा
पंगडंडी सा वो अलबेला
बंसुरी तिरछी तेड़ पर
बुलबुल बैठी उस पेड़ पर
वंही दूर उस मेड़ पर
वो मुझसे रूठा
मेरा बचपन बुलाता है
आ आ जा
पास मेरे आ जा
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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