क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।
अंधेरा आँखों के पटल पर छाया,
नभ को अब कौन यंहा देख पाया ,
फिर भी हम इंटरनेट मोबईल टीवी कंहा छोड़ पाते है ।
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।
कौन सुना करता अब उनका टिमटिमाना,
इस पृथ्वी से उस काले आकाश को निहारना ,
अब यंहा इतना वक्त कंहा कौन किसे दे पाता है ।
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।
ऊपर निचे के बीच कसा फंसा मानव ,
अपने बने संकोचित घेरे से बंधा मानव,
जग का इस सुंदर दृश्य वंचित रह जाता है ।
क्या तारे अब भी हमे लुभाते हैं ।
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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