हर तरफ
हर तरफ इन नजारों में देखो
हर तरफ इन उजाड़ों में देखो
छोड़कर गये तुम इसे इस तरह
हो सके उन आँखों में देखो
एक दर्द मिलेगा अब भी तुमे वंहा
देखते ही उसे वो तेरी आँखों से छलेगा
पूछेगा तब तू खुद से खुद एक सवाल
देख उसका उत्तरा तुझे अब भी ना मिलेगा
पुछ लेना तेरी परछाई से भी कुछ
कंही हो ना जाये वो तुझ से हरजाई
क्या मिला उसे तेरा साथ यूँ देकर
वो कहेगी एक बंजार जीवन अकेला तेरा
अफ़सोस होगा उस उम्र को अकेले में
वो बचपन,जवानी खो गये यंहा वंहा
यूँ ही दूर जाती राहों से ओझल होये वो
अपनों से क्यों कर वो बेगाने होये वो
हर तरफ इन नजारों में देखो
हर तरफ इन उजाड़ों में देखो
छोड़कर गये तुम इसे इस तरह
हो सके उन आँखों में देखो
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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