अपरा थे मी
अपरा थे मी बिसरी ग्युं
कैल हाल पुछणि मेरु मी हर्ची ग्युं
अपरा थे मी बिसरी ग्युं
दूर देश परदेश कु मी छों यात्री
कबि छै मि बि ये गढ़ को रही बासी
अपरा थे मी बिसरी ग्युं
कबि सैणी खाणी हुंदी छै पाड़ा मा
अब मी उडणु छों बल बस आकाश मा
अपरा थे मी बिसरी ग्युं
यकला मा यकलू बैठी रुणु छों
बिता दीणों थे बल बस हेरदूँ छों
अपरा थे मी बिसरी ग्युं
अपरा थे मी बिसरी ग्युं
कैल हाल पुछणि मेरु मी हर्ची ग्युं
अपरा थे मी बिसरी ग्युं
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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