छित्र छित्र हुँयुंच
छित्र छित्र हुँयुंच
मेरु खंड खंड
मेरु उत्तराखंड मेरु उत्तराखंड
सब्युं न धरियूं
अपरी अपरी कनुडी हात
पितृ पितृ बोल्द
कागा मि नि सिनू
अब यख दुध भात
कन तर्पण करूँ
बोई गंगा तू करिली स्वीकार
छित्र छित्र हुँयुंच
मेरु खंड खंड
मेरु उत्तराखंड मेरु उत्तराखंड
ना मि कैं कु
ना क्वी रैगे यख मेरु
कण रैग्युं मि अपरा मा यक्लु गैरु
ढुंग ढुंग छों मि
सारा गढ़ देश पसरी
किले णी बनी बसी
मेर सुप्नीयुं की नगरी
बस मेरा अब पुंगडा कूड़ा
चली मरघट कु बाट
छित्र छित्र हुँयुंच
मेरु खंड खंड
मेरु उत्तराखंड मेरु उत्तराखंड
कु सुणिलु मेर धैय
कु यख झट दौड़ी की हालु
क्वी मेर हात पकड़ी की
म्यारा पुराना दिन दिखालु
क्वी निच रे बच्युं
जो मि थे बच्यालु
त्राहि मा म मगणारी
अपरी बोई थे जगालु
हैरा भैरा दीण फर देख्यालू
छित्र छित्र हुँयुंच
मेरु खंड खंड
मेरु उत्तराखंड मेरु उत्तराखंड
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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