कैका खुठा कख ग्या छन
कैका खुठा कख ग्या छन
कैका पुठा कख रड्या छन
क्वी बी नि अब जणदू रे
मेर बात क्वी बी नि अब मणदू रे
कया हाल कैगे ,सब छत्यानास व्हैगे
ईण तुड़म तुड़ा कैरी की ,तू कैकु काम कैगे
दोई घुठि तेरी ,ई देसी बिदेसी की
तेर कुटम दरी थे ,छीतर बितर कैगे
इन तुण्ड हुंयुँ छे ,तू कख कख मोर्युं छे
ब्यो बरती रौलों खोलों मा बेधुंद पड़युं छे
नि रे गै निर्भगी तेर सोचना कु शोर
अक्ला मा चढ़ी गे तेर दुरु सिरमौर अ
हैरीग्युं मि अब जीती गे तू
ना बात सुणा मेरी पर इं थैली थे तू छोड़ी दे
कन हालु कैगे मीथै बै हालु कैगे
अपरा नि तर अपरुँ का बाना सोचि ले
कैका खुठा कख ग्या छन
कैका पुठा कख रड्या छन
क्वी बी नि अब जणदू रे
मेर बात क्वी बी नि अब मणदू रे
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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