नारंगी की दाणी ये
नारंगी की दाणी ये
कन खाणा हुला भगयान
इंथे बैठी सोली सोली की ये
खटी-मीठी खुदी ये
द्वी दिन का समलौण दिन
समधोला ह्वे गेनी ये
सब एक नि रैंदा ये
अकास धरती कब एक वैंदा रे
मगृजाळ कु रच्यूं ये फेरु ये
क्ख्क हर्ची बिरडी गे ये
मेरु गौं मेरु पहाड़ कु बाटू रे
मेरु गढ़ ऐ उत्तराखंड ये
नारंगी की दाणी ये
कन खाणा हुला भगयान
इंथे बैठी सोली सोली की ये
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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