आच कु फैशण बण्यूं च
आच कु फैशण बण्यूं च
भौल कु जियु ये उड़्यार मा
कबी अल्मोड़ा बजार मा
कबी ऐजा सुमि ड्यार मा
पियार मि करलु अब तैसे
खुलम् खुल्ला गढ़वाल मा
कबी ये बुग्याल मा
कबी मंदिरों की आड़ मा
लुका छिपी का खेल खेळला
अंख्यों की ईं क्याड मा
लोक लाज त्याज की
शरम सारू बेचिकी
मी दगडी भेंट करन ऐजा तू
अपरा बोई बोबो का समण मा
ना दैर ना फिकर कैर
झट जल्दी कैर
ना मिलली आच तू
जुलों मी दूसरी का पास मा
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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