कहो याद पुरानी
कहो याद पुरानी
एक गाँव था और उसकी कहानी है
नानी ने कही थी कभी
अब भी मेरे वो जुबानी है
कहो याद पुरानी
रहते थे वहां हम सब मिलकर
ना इस तरह अब टुकड़ों में जी कर
कुछ ना था पर सब कुछ था वो
अब सब कुछ है पर वो नहीं
कहो याद पुरानी
प्रेम ही प्रेम था वंहा
बरसता था हाथों और बूढी आँखों से
अब खोजों क्यों उनको मै
माथे को जिन ओंठो हाथ ने चूमा था
कहो याद पुरानी
एक एक बात सच थी उस कहानी में
उस नूरानी आँखों की सयानी में
छलक जाती है अब भी उनकी याद
कैसा होगा अब वो मेरा पहाड़
कहो याद पुरानी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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