बांध लेता तुम्हें, मैं अपने प्रेम से
बांध लेता तुम्हें, मैं अपने प्रेम से
कोई कहता मुझे,अगर आ कर अपने प्रेम से
सात सरगम के लहरी भी अब आज कुछ काम थी
आठवां अलाप मैं लग देता बस आज तेरे नाम से
बांध लेता तुम्हें, मैं अपने प्रेम से
कोई कहता मुझे,अगर आ कर अपने प्रेम से
सात रंगों से रंगा इन्द्र का धनुष तुम्हे देखता है वो दूर से
आठव रंग तुम पर देखकर जलता होगा वो भी दूर से
बांध लेता तुम्हें, मैं अपने प्रेम से
कोई कहता मुझे,अगर आ कर अपने प्रेम से
सात आसमानों के आगे क्या होता है ये मुझे मालुम नहीं
वंहा का राही भी गर तुम्हे देख ले भूल जाये अपनी डगर कसम से
बांध लेता तुम्हें, मैं अपने प्रेम से
कोई कहता मुझे,अगर आ कर अपने प्रेम से
सात दरवाजों के पीछे आज छुपी बैठी हो तुम
हाँ कर देती तुम सात फेरे मैं लगा देता तुमसे इस दुनिया के सामने
बांध लेता तुम्हें, मैं अपने प्रेम से
कोई कहता मुझे,अगर आ कर अपने प्रेम से
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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