पुरानी यादों के झरोखों से
पुरानी यादों के झरोखों से
अब भी वो सुनहरी धुप झांक देती है
खिला देती है उस वक्त को जो पीछे छूटा
उस अपने से वो अकेले में मिला देती है
उभरने लगते हैं वो चित्र अपने आप में
उन अहसास के ख्यालों में अपना रंग भर देती है
ले जाती है वो मुझे अपने से वो दूर कहीं
बीती एक एक बात मुझ से वो दोहराती हैं
काश ऐसा होता काश ऐसा किया होता
पिछले फैसलों पर वो फिर प्रश्न खड़ा कर देती है
निहरता रहता हूँ रोज उन झरोखों में
उस से झांकती किरण रोज एक नई कथा लगा जाती है
पुरानी यादों के झरोखों से
अब भी वो सुनहरी धुप झांक देती है
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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