परेशानी से रोज रोज अब बातें होती है मेरी
परेशानी से रोज रोज अब बातें होती है मेरी
खिंचाव तनाव साथ रोज अब मुलाकातें होती है मेरी
कैसा झंझट झमेला है वो तो हर हाल में अकेला है
चिंता, घबराहट का यूँ लगा रहता है लगातार मेला है
किसने रचा और यंहा किसने खेला ये खेला है
परेशानी का ये रंग क्यों होता वो सबसे अकेला है
कठिन है ये डगर बड़ा मुश्किलों से भरा है ये सफर
खीझ कर ही क्यों ना इस पर साथ चलना है हम सफर
परेशानी से रोज रोज अब बातें होती है मेरी
खिंचाव तनाव साथ रोज अब मुलाकातें होती है मेरी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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