क्वी नि रुंदो रे
क्वी नि रुंदो रे अब कैका बाना
रीत हैगे ये पहाड़ ईं लदोड़ी का बाना
क्वी नि रुंदो रे ...............
बल इतगा च ये उकाली को रैबार
उन्दरु का बाटा मा बल रौड़ीगे मेर ब्यार
क्वी नि रुंदो रे ...............
कैल देखण तेथे अब पैथर बौड़ी की
छोड़ीगे तेथे तेर ढुंगा गारो मा खेली की
क्वी नि रुंदो रे ...............
धैरी ले आंसूं अब अपरा आंख्युं पाख्युं मा
क्वी नि आलू अब वैथे मैट ना कुन
क्वी नि रुंदो रे ...............
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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