जाने क्या सोच मैंने
जाने क्या सोच मैंने
और ये क्या मेरे साथ हो गया
जो घर था कभी वो मेरा मंदिर
आज वहां वीराना हो गया
अपना आशियाना बसाने के लिये
मैं आज इससे बहुत दूर हो गया
मेरे बचपन तब मुझसे रूठा
और सदा के लिये वो ख़फ़ा हो गया
स्वर्ग था वो मेरा
अब भी वो स्वर्ग है मेरा
खुद मैंने अपने इन हाथ से अपने लिये
वो नर्क दरवाजा क्यों खोल दिया
परेशान हूँ मैं आज भी
आज भी मैं उस किये पे हैरान हूँ
इतनी बड़ी गलती कैसे
मेरे अपने आप से हो गयी
जाने क्या सोच मैंने ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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