अपने से छुपता रहा
अपने से छुपता रहा
और गैरों से छुपाता रहा
दिया उसने इतना मुझे
फिर भी मैं भीख मांगता रहा
ना समझा था मैं उसे
जो उसे अब मैं समझने चला था
उसके नूर का सारा प्रेम
जब बिखरा हो हर जगह पर
करता भी क्या मैं ध्यानी
उस से ये सब कुछ छुपा कर
देख रहा है वो मुझ को हर पल
बैठा है वो मुझ में ही कहीं पर
अनजान सा फिर राह हूँ यूँ ही
जाना नहीं मैंने खुद को अब तक
साफ़ साफ नजर आ रहा हैं वो मुझे
फिर भी मैं अंधेरों को चाह रहा हूँ
अपने से छुपता रहा ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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