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अब भी इतंजार तेरा है



अब भी इतंजार तेरा है

अब भी इतंजार तेरा है
अब भी मेरा प्यार तेरा है
फागुन के इन बिछे मौसम रंगों में
मुझ पर चढ़ा रंग वो तेरा है
अब भी इतंजार तेरा है ......

ढोल दामों से गूंजता है अपना पहाड़
रसीले गीतों को यंहा छेड़ रही है ये बयार
वो पहला रंग तुम्हारा स्पर्श का अब तक चढ़ा
बावरा मन मेरा उसी प्रतीक्षा में खड़ा
अब भी इतंजार तेरा है ......

अभी तो तुम आ जाओ स्वामी
अभी तक सजाकर रखी है मैंने ये अपनी जवानी
अब तो ये इतंजार की वेदना सहना असहनीय है
बनकर फागुन की फुहार मुझ पर छा जाओ स्वामी
अब भी इतंजार तेरा है ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार
बालकृष्ण डी ध्यानी
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