ADD

दिन इनि ही अब बिती जांदू



दिन इनि ही अब बिती जांदू

दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....

कबी इनि मिथे भास् हूंद
मेर नजरि कि च ई भाषा जी
झुरु झुरु ये अब जिकोड़ी बोंदी
नि कैनु कैकु अब आसा जी
दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....

जियु टूटण च अब ये बोलणा कुण
हर हर लगींच ऐथे एक बारी तेथे बस देखणा कुण
तेर पास ऐथे इन अणा कुण
तेर आंख्युं मा बस जी अब बस जणा कुण
दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....

बडुळि लागि तेरा मेर ये सांकी मा
ये श्वास रोकी की धर्युंच बस जी तेरा भेटि को
हुणि च जिकोड़ी ते थोड़ी मेर पीड़ा
कबी हुली अब तेर मेर से भेंट जी
दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....

नि राई अब मैथे कैकि बी परवा
जणा दे मिथे तू अब पीड़ा का पास जी
दूर भेजी की वो तैसे मिथे
अब लगणू लगे मिथे तेर पास आणे की तिस जी
दिन इनि ही अब बिती जांदू
बल ये यात्रा अब खत्म ही नि हुंदी जी ....

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार
बालकृष्ण डी ध्यानी
Reactions

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ