ग्रीष्म के कहर से
ग्रीष्म के कहर से लगता है अब
चिड़ियों ने चहचहाना छोड़ दिया
ऐसी बरस रही है आग गगन से
मैंने भी बाहर आना छोड़ दिया
बहती थी शीतल गाती थी कोयल
बैठ कर मेरे आँगन के उस पेड़ पर
अब ना रहा आँगन ना ही वो पेड़ भी
कोयल ने भी आ गाना छोड़ दिया
चारों प्रहर अब उष्ण का असर
इस बार की गर्मी से हालत नरम
भावों में मोती काँहा से पिरो लाऊँ
जहाँ जाऊं वहां नीरस की दौड़ है
साँसे है गुमसुम मौसम कि रुनझुन
हवा ने भी देखो अब बहना छोड़ दिया
जलते जंगल और रोते वातानुकूलित
जब इनमे अपना सुख खोज लिया
ना जाने किधर ले जायेगी वसुंधरा
झर झर के कब अब बहेंगे निरझर
बरखा की धुन सुनने दिल बेकरार
सावन दूर इसलिए मन उदास है
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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