ये ज़िंदगी तेरे लिये
तुम ने बताया भी नहीं और मैंने सब जान लिया
आँखों में उमड़े तेरे अहसासों को यूँ पहचान लिया
आधी-अधूरी जैसे भी थी वो कहानी तो थी मेरी ही
जिक्र मेरे जब भी आया तूने दिल क्यों थाम लिया
हज़ारों काम थे पड़े मेरे तेरे लिए मैंने सब छोड़ दिये
रोना नहीं था चुपके मुझे सब कोरे पन्ने उतार दिये
दो घड़ी की चाहत मेरी जमाने ने बना दी आफत तेरी
उम्र गुजर गयी अब वो तेरी चाहत निभाने को मेरी
जब आ जाती दुनिया घूम कर हवा समाने जब मेरे
तब सोचता हूँ बैठे गुज़रे ज़माने क्यूँ लौट आते नहीं
इस ज़िंदगी में सब नसीब के हाथों क्यों लिखा बिका
हम जैसे फकीरों को सर पर भी तेरा थोड़ा हात फिरा
ये ज़िंदगी तुझे ढूंढते ढूंढते मैं कहाँ कहाँ ना गया
फिर भी तेरा दीदार ना हुआ हसरत तरसती ही रही
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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