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सम्मान


सम्मान

ना चाह थी
ना आस थी
जिंदगी बस बर्बाद थी

कभी आह पे
कभी शाख पे
प्रश्न उभरे हर ख्याल पे

कभी दूर हूँ
कभी पास हूँ
बस नजरों से परेशान हूँ

थोड़ी मीठी सी
थोड़ी खारी सी
चटपटी भेल लाजवाब सी

मुश्किलों घिरा हुआ
टूटा हुआ थोड़ा जुड़ा हुआ
बस हौसलों संग लगा हुआ

लड़ रहा हूँ
बस सम्मान के लिए
फिर जीत हो या हार हो

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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बालकृष्ण डी ध्यानी
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