मैं हंगामी पंछी
उड़ने लगे हैं पंछी
छोड़ अपनी डाला को
आशियाना नया बसाने
ना जाने किस डाला पर
स्वार्थों ने मुझे भी
अब स्वार्थी बना डाला
थोड़ी सुविधा दिखी उस पेड़
असुविधा पेड़ छुड़ा डाला
हंगामी पंछी बन आता हूँ लौटकर
असुविधा हो जब सुविधा पेड़ पर
दो पल बैठक लगा अपनों के संग
उड़ जाता हूँ फिर सुविधा पेड़ पर
मैं हंगामी पंछी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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बालकृष्ण डी ध्यानी


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