सुबह के आठ बजे
चेहरे पे तेरे...बारह बजे हैं.. (२)
सुबह की है ये तो घडी है
सोच क्यों तेरे मुख पर पडी है
किसके लिये जां आफत मै खड़ी
चेहरे पे तेरे...बारह बजे हैं...
रोज यही शुरवात होती है क्या तेरी
क्या नोकरी मै जाने की होगई देरी
बॉस चल देगा दटों की छडी
बना देना बहान ना बजी अलार्म की घड़ी
चेहरे पे तेरे...बारह बजे हैं...
रहता है परेशां सोते हुयी भी क्या
नींद कैसी आती है मुझे बता
सपने भी रहते होंगा खफ़
पर तुझ को कुछ नहीं पता
चेहरे पे तेरे...बारह बजे हैं..
बेवी तेरी मायके गयी है क्या
या घर पर तुझे दे रही है सजा
लिस्ट हाथों सामना का पखडा दिया होग
कैसी तो आज आपने बचा
चेहरे पे तेरे...बारह बजे हैं..
कोई तो होगा समझेगा तुझे
कोई तो होगा मानेगा तुझे
कोई तो होग रह बथलायेगा
कोई तो पास बोलायेगा
चेहरे पे तेरे...बारह बजे हैं..
क्यों रूठा होव है रब से
पाया नहीं कुछ भी जग से
अपनी इस आदत को भुला
सवेरे चेहरे को खोश्यीओं से सजा
ले ले जीवन का मजा
यों चेहरे सवेरे के आठ बजे....बारह ना बजा...
चेहरे पे तेरे...बारह बजे हैं.. (२)
सुबह की है ये तो घडी है
सोच क्यों तेरे मुख पर पडी है
किसके लिये जां आफत मै खड़ी
चेहरे पे तेरे...बारह बजे हैं...
बालकृष्ण डी ध्यानी
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी

0 टिप्पणियाँ