हमको तडपती रही
असके गम अशूं बहती रही
आपने को समझती रही
रातभर रुक रुक कर
शिस्कियाँ आती रही
अंधेरे मै हम नशी हम पर
बिजलियाँ गिरती रही
हम को जलती रही
मोम की तरहां पिघलती रही
शमा पर हमे
भंवरे की तरह मंडराती रही
हमको तडपती रही
बालकृष्ण डी ध्यानी
असके गम अशूं बहती रही
आपने को समझती रही
रातभर रुक रुक कर
शिस्कियाँ आती रही
अंधेरे मै हम नशी हम पर
बिजलियाँ गिरती रही
हम को जलती रही
मोम की तरहां पिघलती रही
शमा पर हमे
भंवरे की तरह मंडराती रही
हमको तडपती रही
बालकृष्ण डी ध्यानी
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी

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