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सुख और दुःख

सुख और दुःख
कंही सुख तो कंही दुःख है
यही तो ओ सुख और दुःख
ना आंखें मोंद बंदे
हम तो रहते तेरे मुख
खुली अखूं से देख सपने
कुछ नहीं तो दो पल है आपने
दो पल बाद हो जाएंगे पराये
आपने सुख और दुःख पराये
यही तो ओ सुख और दुःख ....
कोई गीतों मै सजाये
कोई अश्कों मै बहाये
कोई दीप मै जलाये
कोई अँधेरा बन तडपाये
उजाला सुख है अँधेरा दुःख
यही तो ओ सुख और दुःख ....
ये तो आते जाते रहते
ना कर गुम इनका
दुःख मै अगर खुशीयां मनाये
फिर सुख कहँ खोये
फिर दुःख कहै को होये
यही तो ओ सुख और दुःख
कंही सुख तो कंही दुःख है 

कवी बालकृष्ण डी ध्यानी
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