सुनहरी शाम पहडूं पर ढलह तै ही
सुनहरी शाम पहडूं पर ढलह तै ही....
एक अहशास जगा देती है
मन को अपना बना देती है
शब्दों को पतों की आड़ मै छिपा देती है
सुनहरी शाम पहडूं पर ढलह तै ही......
दिन की थकन अपने संग औडै
आकाश को अंधकार मै छुडै
संसार से एक वाद कर के
आपने पन मै लीं हो जाती है
सुनहरी शाम पहडूं पर ढलह तै ही....
रवी की किरणों को समाती
कवी लेखनी को उभरते हुये
नयी सुबह को पेरण दे जाती
एक ढलती सुनहरी शाम
सुनहरी शाम पहडूं पर ढलह तै ही....
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी


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