कहलाई तू वीदैही
तेरी वेदना हर वेदों नै गयी
देवता नै भी तेरे आगे शीश नवाई
इस कलयुग मै दल ऩा गल पाई
तुझे लुटने लगे तेरे ही भाई
समाज रूपी रवांण से तू भी ऩा बच पाई .........................
रही इस देहा से दूर
कहलाई तू वीदैही
समाज रूपी रवांण
से तू भी ऩा बच पाई
आज की हर सीता भी धरती मै समयी
समाज रूपी रवांण से तू भी ऩा बच पाई .........................
फूलों से सुन्दर
नाजुक से तेरी कलाई
खिचे यहाँ हर दुशासन:
कहँ हो कृष्ण कन्हाई
आज की दुर्पादी दे रही दुहाई
समाज रूपी रवांण से तू भी ऩा बच पाई .........................
तेरे नाम का विष का प्याला
कीता नु नै पी डाला
यंहा विष का मंथन
अब अपनो नै कर डाला
आज की मीरां को अपनों नै मार डाला
समाज रूपी रवांण से तू भी ऩा बच पाई .........................
लैला लैला करता रहा
अखीर मै जां गंवाई
आज के युग के मजनू
देखो हर दर पे करे सगाई
आज की प्रेम ने भी देखो कैसे रस रचाई
समाज रूपी रवांण से तू भी ऩा बच पाई .........................
कलियुग है कलियुग है भाई
इस मै सत-युग की बात कंहा से आयी
आज जहाँ से भी जाऊं
पुहंचे मुझ से हर रघुराई
धुह्बी की एक बात जानकी क्यूँ गवाई
समाज रूपी रवांण से तू भी ऩा बच पाई .........................
तेरी वेदना हर वेदों नै गयी
देवता नै भी तेरे आगे शीश नवाई
इस कलयुग मै दल ऩा गल पाई
तुझे लुटने लगे तेरे ही भाई
समाज रूपी रवांण से तू भी ऩा बच पाई .........................
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदार नाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी


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