कलयुगी प्यार
आज का मजनु कल की लैला
इस कलयुग मै कैसा खेल खेला
धन का अब सब लगा के ठेला
बीच बजरिया मै जाकर बेचा
लहरों का आशियाना हमरा
डूबी कश्ती जंहा था किनारा
बेपर्दा कीया पर्दा नशीनो ने
पर्दो मै छिपा रहा नकाब उनका
पत्थर मारे फटाता सर हमरा
लहू लुहन जखमी दिल हमरा
सदीयाँ की बस यही कहानी
भटकता बस मजनु ही भाई
लैला हरदम रही अनजानी
बात मान दिलबर मेहरबानी
किश्तों मै बंटेगा प्यार हमारा
जिसको पड़ेगा उम्र भर चुकाना
वफाई बैवाफई की सफाई
उम्रभर वकालत की करवाई
कीया प्यार हमने ये कैसा
जीसके लिये क्या कीमत चुकाई
आज का मजनु कल की लैला
इस कलयुग मै कैसा खेल खेला
धन का अब सब लगा के ठेला
बीच बजरिया मै जाकर बेचा
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
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मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी

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