प्यास
अशकों ने अशकों को बहाया था कभी
आईने मै अशकों को छुपाया था कभी
तस्वीर ने तक्दीर को रुलाया था कभी
तकदीर ने तस्वीर को हंसाया था कभी
बुंद गिरी जब पलकों से उसे सजाया था कभी
आंख मुंदकर पलकों मे उनेहे छुपाया था कभी
प्रेम के खाली अक्षर पन्ने मे उतारे थे कभी
पत्र के गीलापन ने हमने बतया था कभी
पलंग के सीलवाटूओं मे खोया था कभी
पडे पडे अकेले रातों मे वो रोया था कभी
दिल की प्यास मेरी जो रही तुम्हरे पास ही
खोजा करती हों उसे मे क्यों?अपने पास ही
अशकों ने अशकों को बहाया था कभी
आईने मै अशकों को छुपाया था कभी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
कवी बालकृष्ण डी ध्यानी

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