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कैसे मोड़ो


कैसे मोड़ो 

दिल टूटकर अब पहाड़ मै दबा है 
कैसे खोजो मै उस पर गुजरें कंही करवाँ है 
कैसे मोड़ो इन राहों को ...............

एक एक यंह होआ बस जुदा है 
दुर हिमाल भी अब हम से खफा है 
कैसे मोड़ो इन राहों को ...............

एकांत और सन्नाटा का शोर दुर तक है 
क्या करों अपनों का ही कर्णपर्द फटा है 
कैसे मोड़ो इन राहों को ...............

आँखों का खालीपंन कुछ कहता है यंह 
अपना अपनों से दुर अब कोई रहता है 
कैसे मोड़ो इन राहों को ...............

दबी दबी सी चाह हर ओर यंहा 
खिलती है यंहा पर भी भोर दोपहर संध्या और निशा 
कैसे मोड़ो इन राहों को ...............

कोई राह देख रहा है कोई पास बोला रहा है 
बस दिल अपनों से दुर चला जा राहा है 
कैसे मोड़ो इन राहों को ...............

कैसे मै अपने को ही समझा राह हों 
करवाँ है की बस चलता चला जा राहा है 
कैसे मोड़ो इन राहों को ...............

दिल टूटकर अब पहाड़ मै दबा है 
कैसे खोजो मै उस पर गुजरें कंही करवाँ है 
कैसे मोड़ो इन राहों को ...............

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

बालकृष्ण डी ध्यानी
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