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अपनी मौत का समा सजाये बैठा


अपनी मौत का समा सजाये बैठा 

आदमी अपने ही खात्मे का सामान बनाये जा रहा है
अपनी मौत को ओर करीब लाता जा रहा है 

अपनी उम्रदराज प्रति दिन कम करता जा रहा है 
खुद के बनायी परेशानी में खुद ही घिरा जा रहा है 

बड़ा खुश हो रहा है नये नये अविष्कार करके 
उन अविष्कारों के दुष्ट प्रभाव में खुद जकड़ा जा रहा है 

नये नये रंग दर्शाती है प्रकृति हर समय पल पल 
पर अपने ही बनाये रंगों से विहीन होता जा रहा है 

प्रकाश का प्रतिबिम्ब है दर्पण वो सुनहरे पल 
उस को कैद करके वो खुद ही खुद इतर रहा है 

आराम की दुनिया बनकर अपने लिये ही वो 
बीमारी का पिंजरा इस शरीर को बनाये जा रहा है 

आदमी अपने ही खात्मे का सामान बनाये जा रहा है
अपनी मौत को ओर करीब लाता जा रहा है 

एक उत्तराखंडी 

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

बालकृष्ण डी ध्यानी
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