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तुम भी कवी हो


तुम भी कवी हो

हाँ मै भी कवी हूँ 
मै भी कविता लिख सकता हूँ 
दो शब्द को जोड़कर 
अलंकारों का रुख मोड़ सकता हूँ 
हाँ मै भी कवी हूँ 

कभी निर्मल बहकर 
कभी अति वेग साथ 
धाराओं को ओढ़ सकता हूँ 
जटा में धर धरा पर छोड़ सकता हूँ 
हाँ मै भी कवी हूँ 

कविता उन्मुक्त है 
स्वछंद है आपने विचारों से 
कलम से उसे सींच सकता हूँ
शांती उमंग व्यंग दुःख में भी जी सकता हूँ 
हाँ मै भी कवी हूँ 

यूँ ही चिला चला जा रहा था वो 
एका एक मैंने रोका और पुछा लिया 
क्या बात है क्यों हो उदास 
उसने कहा कोई नही कहता की कवी हूँ मै आज 
हाँ मै भी कवी हूँ 

मैंने कहा क्या है तुम्हरे पास 
उसने कहा है कल्पनाओं का साथ 
झट मैंने कहा तुम भी तो कवी हो मेरे यार 
अपनी कल्पना को पन्नों पर उभारो ना करो देर 
मै कहता हूँ तुम भी कवी हो आज 

एक उत्तराखंडी 

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत 

बालकृष्ण डी ध्यानी
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