
चल अपरू गढ़देश जोंला
हे रै भुल्ला कंन लगनु
तै थै मयारू गढ़देश..२
हे सच्च बता कुछा ना छुपा
कंन लगनु मयारू मायदेश
हे भुल्ला मेर भुल्हा तू
कंन लगनु मयारू गढ़देश …………
हे दीदा क्या बुलाणु तै थै
सच बोललू लागु तै थै दिल मा ठेस
हैर दी बौजी आंखी पूछ दी मी थै
किले गै तेरु दीदा छोडीकी ऐ देश
हे भुल्ला मेर भुल्हा तू
कंन लगनु मयारू गढ़देश …………
हे रै भुल्ला कुछ ना लुका
आपरी आंखी मा तिल क्या छुपा
आपरी जिकोडी मा ना कोई भेद छुपा
ब्याकुल च मन मयारू कंन व्हालो मयारू देश
हे भुल्ला मेर भुल्हा तू
कंन लगनु मयारू गढ़देश …………
अन्ख्युं छुपा दणमण आंसूं दीदा
भेद जिकोडी मा लगी एक रेघा
जन का तन च गढ़ देश अपरू
जन जब छोडीकी गै तू विदेशा
हे भुल्ला मेर भुल्हा तू
कंन लगनु मयारू गढ़देश …………
हे रै भुल्ला मी समझी गयुं जिकोडी पीड़ा अलजी गयुं
ना लगा ना लगा और गढ़देशा की व्यथा
मै सै ही सब उपजयो विपदा कू काथा
कंण प्रगती कारलो मेरु गढ़ देश
जब हम थै सब बस्याँ यख परदेश
हे रै भुल्हा चल जोंला उठा दगडा दगडी
चल जोंला आपरू गढ़देश अपरू मायदेश
दोई रोटा कम खोंला मेहनत ज्याद करोंला
गढ़देश थै आपरा सरग बनोला
चल रै भुलाह चला दगडी जोंला चल राइ दीदा
अपरू गढ़देश अपरू मायदेश
एक उत्तराखंडी
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत
बालकृष्ण डी ध्यानी

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